पूज्य सन्त बाबा आसूदाराम साहिब

परिचय :

सिन्ध देश सन्तों और दरवेशों और सूफियों का देश माना जाता है। सक्खर और रोहड़ी तो जैसे सिन्ध के मुख्य तीर्थ स्थान हैं, जहाँ पर कई महापुरुषों और सन्तों ने जन्म लिया। सन्त बाबा आसूदाराम भी उन्हीं महान सन्तों में से एक थे। सिन्ध की पवित्र भूमि के सक्खर जिले में पन्नो आकिल तालुके के जटोईन गाँव में भाई लुधूमल के घर माता चन्नी बाई की कोख से सन्त बाबा आसूदाराम का जन्म रामनवमी को सन् 1895 में हुआ।

वे बाल्यावस्था से ही नम्र स्वभाव के थे। दूसरे बालकों की अपेक्षा वे शान्त स्वभाव के थे, उनमें चंचलता लेशमात्र भी न थी, जिससे गाँव के समस्त नर-नारियाँ उनकी ओर आकर्षित होते थे। जब वे पढ़ने-लिखने के योग्य हुए तो उनका दाखिला स्कूल में कराया गया, किन्तु वे अधिक पढ़-लिख न सके क्योंकि “दुनियावी” शिक्षा में उनकी कोई दिलचस्पी न थी। अधिकांशतः वे एकान्त में वैरागियों की भाँति बैठे रहते थे। यही वैराग्यवृत्ति उनके पिता की चिन्ता का कारण बनी।

अतः उन्होंने अपने बालक को सन्त शिरोमणि साईं सतरामदास, श्री क्षेत्र रहड़ी की सेवा हेतु स्वीकारने की विनती की। सन्तजी ने उनकी विनती को स्वीकारते हुए कहा कि इसे अभी कुछ बड़ा होने पर, आप सेवा हेतु भेजें।

सन्त सतरामदास जी की कृपा दृष्टि पड़ते ही बालक आसूदाराम के मन में संसार के प्रति मोह हट गया और प्रभु के लिए अनुराग उत्पन्न हो गया। वे सदा सतगुरु से मिलने की प्रबल इच्छा प्रकट करते रहते थे। परन्तु इसी बीच साईं सतरामदास जी प्रभु की ज्योति-ज्योत में समा गए।

सन्त कंवरराम जी सतगुरु सतरामदास जी के स्थान पर उनके पूरे कार्यभार की सेवा संभालने लगे। सतगुरु के पूर्व आदेशानुसार बालक आसूदाराम को रहड़ी में सन्त कंवरराम जी के सुपुर्द कर दिया गया। सन्त कंवरराम जी ने उन्हें स्थान की सेवा हेतु स्वीकार किया।

न केवल इतना वरन् साईं सतरामदास जी की इच्छानुसार ठीक वैसी ही दया दृष्टि भी उन पर डाली, जैसी साईं सतरामदास जी ने सन्त कंवरराम पर डाली थी। सन्त आसूदाराम ने भी अपने गुरु चरणों की सेवा “मनसा वाचा कर्मणा” से वैसी ही की, जैसी सन्त कंवरराम जी ने अपने गुरु की की थी।

सन्त आसूदाराम गायों की हृदय भाव से सेवा करते थे। यहाँ तक कि गायों के बैठने के स्थान की भूमि को नरम करते और उस पर खुद नंगे बदन लेटकर यह देख लेते थे कि कहीं कोई कंकड़, पत्थर या काँटा तो नहीं पड़ा है जो मेरी गुरु माता को चुभ न जाए। इस प्रकार संतुष्ट होने पर ही गायों को गौशाला में बाँधते। यह गौशाला आज भी सेवारत है।

यद्यपि सन्त आसूदाराम जी की हार्दिक अभिलाषा थी कि वे आजीवन गुरु चरणों की सेवा में रहें, परन्तु सन्त कंवरराम जी की आज्ञानुसार उन्होंने अपने गृहस्थ जीवन की नींव रखी। गृहस्थ जीवन में आश्रम के समस्त नियमों का निर्वाह करते हुए गुरु की आज्ञा शिरोधार्य की, क्योंकि सन्त कंवरराम जी का मानना था कि “सच्ची सेवा केवल गृहस्थ जीवन में ही सम्भव है।”

गुरु की आज्ञानुसार ही उन्होंने “पन्नो आकिल” शहर में सन् 1940 को “दरबार साहिब” की स्थापना की, जो भारत व सिन्ध में प्रसिद्ध है, जहाँ मानव उत्थान के अनेक कार्यक्रम आज भी चल रहे हैं।

सन्त आसूदाराम जी की दरबार में सदैव 24 घण्टे लंगर चलता है। कोई भी भूखा वहाँ से बिना खाये-पिये नहीं जाता। भोजन के साथ-साथ ठण्डे, मीठे जल की भी सेवा होती है। यह सब बिना किसी जाति और धार्मिक भेद-भाव के होता है।

सबसे बड़ी सेवा थी दुखियारों के दुख दूर करने की। वहाँ से कोई भी सवाली खाली नहीं जाता। वह ऐसा दरबार है कि जो भी निराश आता था, आशावान होकर लौटता। अनेक असाध्य शारीरिक और मानसिक रोगियों को सन्त आसूदाराम जी गुरुवाणी द्वारा ठीक कर देते थे। कई निस्सन्तानों को सन्तान मिलने पर यहाँ आत्मसंतोष मिला है।

इस दरबार में गुरुमुखी की शिक्षा आरम्भ से ही दी जाती थी और सन् 1975 से यहाँ विधिवत पाठशाला चलने लगी, जहाँ गुरुमुखी के साथ-साथ हिन्दी की शिक्षा भी दी जाती है। जिसमें लगभग 250 विद्यार्थी प्रति वर्ष शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं और अभी तक हजारों विद्यार्थी लाभान्वित हो चुके हैं।

वहाँ वृद्धजनों की सेवा के लिए एक वृद्धाश्रम भी चल रहा है तथा बेसहारा वृद्धों और शारीरिक रूप से विकलांग लोगों की जी-जान से सेवा की जाती है। उन्हीं के सौजन्य से एक सामान्य रुग्णालय व प्रसूति गृह भी संचालित हो रहा है।

इस प्रकार सन्त आसूदाराम दरबार न केवल एक धार्मिक आस्थान है, वरन् एक सामाजिक चेतना और मानव कल्याण का केन्द्र बन चुका है।

बाबा आसूदाराम जी अन्ततः चतुर्दशी रविवार 4 सितम्बर 1960 (मिति 19 माह भादो संवत 2017) को प्रभु के कार्यों को पूर्ण करते हुए यह संसार छोड़कर परमधाम सिधारे।

बारहवीं के दिन सतगुरु दर (रहड़ी दरबार) के हाजिर सन्त भगत चन्द्रराम साहिब जी ने सन्त आसूदाराम जी के सुपुत्र श्री चाँडूराम जी को 14 वर्ष की अल्प आयु में नवीन परम्परा अपनाते हुए पिता की गद्दी पर बैठाया और गुरु दरबार की पगड़ी (सिरोपा) पहनाकर सुशोभित किया।

तब से लेकर उनके सुपुत्र साईं चाँडूराम जी के तत्त्वावधान में हर वर्ष बाबा जी की वर्सी सिन्ध “पन्नो आकिल” दरबार में और भारत में उनकी वर्सी व जयन्ती “शिव शान्ति आश्रम” आलमबाग, लखनऊ में बड़े उत्साह व श्रद्धा से मनाई जाती है।

इस वर्सी के उत्सव पर समस्त भारत के सन्त, भगत, गुणिजन और महात्माओं का संगम होता है। जिसके बीच साईं चाँडूराम जी “चन्द्रमुखी” की भाँति सुशोभित होते हैं और उस समय ऐसा लगता है कि जैसे सन्त आसूदाराम जी स्वयं श्रद्धालुओं की मनोकामना पूर्ण करते हुए प्रगट रूप में आशीर्वाद दे रहे हों।

सन्त आसूदाराम जी के नाम से भारत के अनेक प्रमुख नगरों में उनके नाम से सेवा समितियाँ गठित की गई हैं, जो निस्वार्थ भाव से समाज के निर्धन व जरूरतमंद परिवारों की यथाशक्ति सेवा कर पुण्य अर्जित कर रही हैं। सन्तजी के नाम से अनेक नगरों में सत्संग स्थल भी उनके अनुयायियों द्वारा निर्मित किये गये हैं।

अतः ऐसी निस्वार्थ व त्यागी महान विभूति के पावन चरणों में कोटि-कोटि नमन।